Friday, September 10, 2010

ये मशीन नहीं हमारे अपने लोग है...


दिल्ली के एक मेट्रो स्टेशन पर सुरक्षा जाँच के दौरान एक सी आई एस ऍफ़ के जवान से रूबरू हुआ। एस्कैन मशीन जो एक मशीन होने के नाते ख़राब हो गया था जो मशीनो की फितरत में शुमार है। कर्तव्यपरायण सिपाही तुरंत खुदसे सामानों की जांच करने लगे मानो देश पे आक्रमण हो गया हो। परेसान होना तो लाजिमी था। सामने से एक कपल जा रहा था। लड़की बेहद खुबसूरत थी। तराशा हुआ भरा पूरा शारीर तीखे नैन नक्श सबको अपनी तरफ आकर्षित कर रहे थे। लाल रंग के टी शर्ट और स्टोन वाश कलर का जींस उस मोहतरमा पर खूब फब रहा था। जो भी उस लड़की को देखता कुछ देर खो जाता उसे ऊपर से निचे तक निहार लेता। ऐसी खुबसूरत मॉडल टाइप की गर्लफ्रेंड को पाकरउसका बॉय फ्रेंड बड़ा प्राउड फील कर रहा था जो उसके चेहरे से झलक रहा था. । मैंने भी एकबार देखा। फिर सिपाही की तरफ देखा। हमारी आँखों ही आँखों में बात हो गयी। सिपाही मुस्कुराने लगा। तभी एक आदमी जिसका बैग वो सिपाही चेक कर रहा था ने डाटते बोला - अरे बैग चेक करो और सुरक्षा जांच पर ध्यान दो, ड्यूटी करना छोर लड़की देख रहे हो ? सिपाही के चेहरे पर गुस्सा स्पष्ट झलक रहा था पर वो कुछ कह नहीं पाया। फिर वो आदमी चला गया। जब मेरी बारी आई तो मैंने सिपाही से बोला - अब तो हुस्न को देखना भी गुनाह हो गया जनाब क्यों ? इसपर सिपाही और उसका सिनिअर मुस्कुराने लगे। सिपाही ने कहा - यार हम भी इंसान है मशीन नहीं ! मैंने कहा - साहब आप लोग पर ही तो हमारी सुरक्षा टिकी है कुछ पागल टाइप के भी लोग होते है आप उनकी बात को दिल से मत लीजिये। मुझे सिपाही की बात दिल को लग गयी। हम खुलेआम घूमते फिरते है फिल्म देखते है बाजार जाते है और जब मर्जी हो छुट्टी भी कर लेते है, अपने परिवार वालो के साथ कही सैर करने चले जाते है, बच्चो के साथ पिकनिक पर जाते है यानी अपनी स्वतंत्रता का भरपूर रसास्वादन करते है। दूसरी तरफ ये सिपाही पुरे ड्यूटी के दौरान एकदम सतर्क होकर हमारी और देश के सुरक्षा के लिए पूरी तत्परता से सेवा करते है। स्वतंत्रता दिवस, दिवाली, होली, ईद और यहाँ तक की रविवार को भी ये लोग ड्यूटी देते है। क्या हमारा फर्ज नहीं की कम से कम इन्हें मशीन नहीं इन्सान समझा जाये ? ड्यूटी के दौरान इनको सहयोग देने के साथ ही साथ दोस्तों की तरह बर्ताव की जाए। और कुछ नहीं तो कम से कम थैंक्स तो बोल ही सकते है। अपने परिवार से बहुत दूर अपने कर्त्तव्य का पालन करने वाले इन सिपाहीओ के लिए हम ही तो इनकी फॅमिली और दोस्त है। ये हमारे अपने लोग है।

Monday, September 6, 2010

वोमिटिंग करना है तो देखिये फिल्म 'हेल्लो डार्लिंग'


यह एक ऐतिहासिक फिल्म थी मेरी जिंदगी के लिए...निकृष्ट फिल्म बनाने की कला का सर्वोत्कृष्ट उदहारण...दर्शको को बोर करने की पराकाष्टा....पैसे को अगर नाली में फेक देते तो भी एक सार्थक काम होता. शायद... किसी को मिल जाये और वो उसके काम आ जाये...पर इस फिल्म को देखने में खर्च किये पैसे के लिए मै अपने आप को कभी माफ़ नहीं करूँगा. इससे पहले भी एक फिल्म आई थी - कमल हसन की 'दशावतार'. ऐसे महान फिल्म निर्माताओ और मूर्घन्य पटकथाकारो से मेरा विनम्र निवेदन है की कृपया आप ऐसे फिल्म बनाने के पीछे अपनी अद्भुत मंशा को जगजाहिर करे. हेल्लो डार्लिंग की बात करे तो फिल्म किस विषय पर था...उस सत्य का छिद्रान्वेषण तो शायद मशहूर जासूशी कथा लेखक अर्थेर कानन डायल भी नहीं बता सकते. दिलकश अदाकारा ईशा कोप्पिकर की अचंभित करने वाले डाएलोग डेलिवरी का तो मै कायल हो गया ! किसी को भी आकर्षित कर सकने वाले खुबसूरत सुडौल बॉडी पर अत्याधुनिक वस्त्रो को धारण किये ये अप्सरा ठेठ हरयाणवी बोलती है ...सुना आपने ? हरयाणवी ! शायद आपको हाजमोला की जरुरत हो. सेलिना जेटली और गुलपनाग के बारे में कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि फिल्म में उनके साथ उनका बॉस शोषण करता है पर मुझे तो ये वास्तविक घटना लगाती है. गुल पनाग ने इस फिल्म को क्यों चुना मुझे समझ में नहीं आया. यह फिल्म उसके करियर के लिए एक दाग है. गुलपनाग की फिल्म देखि थी - धुप. क्या मस्त फिल्म थी और लाजवाब एक्टिंग अपर इस फिल्म में उसके साथ इन्साफ नहीं हुआ. अगर जावेद जाफरी जिन्हें अब हीरो बनने
का शौक चढ़ा है...कही मिल जाए तो फिर यह जरुर शाबित कर दूंगा की 'इंसान भी कभी जानवर था ' ऐसे मानसिक शोषण करने वाले फिल्म निर्माताओ को बॉलीवुड से बहिस्कृत कर देना चाहिए.