Sunday, October 20, 2013

'वाद' और 'पंथ' का दौर



'वाद' और 'पंथ' का दौर है। ये उत्तर आधुनिकता का युग है जिसमे 'निष्पक्षता' विधवा के श्रृंगार की तरह अछूत माना जाता है। धारण कर लिया तो लोग नाक भौ सिकोरेंगे आलोचना होगी प्रसंशा नहीं । अपनी सामाजिक स्थिति अखंडित रखने के लिए किसी 'वाद' या 'पंथ' के शरण में जाना अनिवार्य हो गया है। अब अगर आप मजदूरो की हित की सोच रहे हैं या मौजूदा सरकार की आलोचना कर रहे हैं तो लोग कहेंगे "तुम वामपंथी हो का ?" प्रजातंत्र के हिमायती है और सरकार की प्रशंशा कर रहे हो तो लोग कहेंगे "दक्षिणपंथी हो का ?" धर्म की बातें करे तो कहते हैं "सांप्रदायिक हो का ?" किसी राज्य के बारे में बात करे तो "क्षेत्रवादी हो का ?" देश भक्ति की बात करे तो "राष्ट्रवादी हो का ?" किसी भाषा की प्रशंशा करे तो "भाषावादी हो का ?" अमेरिका की प्रशंशा कर दो तो "साम्राज्यवादी हो का ?" इस्लाम की प्रशंशा कर दो तो "जिहादी हो का " स्त्रिओ के अधिकार की बात कर दो तो "स्त्रीवादी हो का ? " शोषित पुरुषो की बात कर लो तो "पितृ सत्तावादी हो का ?" संस्कार संस्कृति के क्षरण पर चिंतित दिख गए तो "परम्परावादी हो का ?" फेहरिश्त लम्बी है महाशय और बौद्धिकता के हर चरण के साथ इसका आयाम भी हनुमान की पूंछ की तरह दीर्घ होता जा रहा है। समाज 'कृत्य प्रधान' की जगह 'कारक प्रधान' हो गया है। ये चिंता की बात है। सेकुलरवादी साम्प्रदायिको का सर्वनाश चाहते हैं। सांप्रदायिक लोग सेकुलर्वदिओ का अस्तित्व ख़त्म करना चाहते हैं। वाद की जगह वादियो के बिच तलवार खिची है। किसी नास्तिक के मृत्यु पर आस्तिक खुश हो जाते हैं क्योंकि इसका कारण इश्वर में आस्था का नहीं होना है। आस्तिक कारण देख रहे हैं कृत्य नहीं। जबकि मानवीय आधार पर यहाँ मृत्यु पर शोक व्यक्त होना चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा। ये 'वाद' और 'पंथ' का घृणित रोग मानवीय रिश्तो को सड़ा रहा है। वर्गो में विभाजित कर रहा है। हम फिर से बट रहे हैं। इतिहास साक्षी है समाज बटता है तो फिर पतन की ओर जाता है विकास की और नहीं। ये नियम प्राकृतिक हैं।

कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा


 निर्णय लेने या न्याय करने की क्षमता हम मनुष्यों का सबसे बड़ा गुण है।  किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़ा हो जाना हमें नायक और खलनायक की श्रेणी में विभाजित तो करता है परन्तु दोनों ही स्थितिओ में निर्णय लेने की योग्यता और साहस होनी चाहिए । ये एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे कायर नहीं कर सकते। कायर तथष्ट रहना चाहते हैं। इनके निर्णय बाह्य कारणों से  ज्यादा प्रभावित होते हैं।  इस मामले में हम कायरो की श्रेणी में शामिल होते जा रहे हैं। ऐसा क्या हो गया की हमने जूलियन असान्जे को शरण देने से मना  कर दिया ? और इक्वाडोर जैसा छोटा देश शरण देने को तैयार हो  गया ? बाह्य दबाव ? लाभ हानि की चिंता ? शर्मनाक स्थिति है। याद रखिये, जब  पूरी दुनिया ने यहुदियो को शरण देने से मना कर दिया था तो भारत ने यहुदियो को शरण दिया।  दक्षिण भारत के चेन्नई में आज भी इनके घर और पूजास्थल इस बात के गवाह हैं। इस्राएल बन्ने के बाद ये वहा से चले गए परन्तु आज भी इनके ह्रदय में भारत के लिए एक मातृभूमि जैसा सम्मान हैं। शरण देते समय राजा ने किसी बाह्य या आतंरिक दबाव की चिंता नहीं की। लाभ हानि की चिंता नहीं की बल्कि अंतरात्मा रूपी न्यायधीश की बात सुनी। मानवीय रिश्तो और मूल्यों  की चिंता की। उस समय तो हिन्दू राजाओं द्वारा तानाशाही थी पर यहुदियो को शरण दी गयी। आज हम प्रभुत्वासम्पन्न हैं  पर असान्जे को शरण नहीं दिया।  आज हम  धर्मनिरपेक्ष हैं पर हमने सलमान रुश्दी को शरण नहीं दी। आज हम  प्रजातान्त्रिक हैं पर हमने  तसलीमा नसरीन को शरण देने से मना कर दिया। लाभ हानि के समीकरण ना बिगड़ जाए इसलिए अतिथि देवो भवः  का धर्म त्याग दिया। देखते है कायरता के मार्ग पर हमारी यात्रा आगे कब तक जारी रहती है।