Thursday, April 23, 2015

देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं

मेरे मुताबिक दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो जो खर्च करते हैं देते हैं बाटते हैं दूसरा वो जो संचित करते हैं लेते हैं बचाते हैं. संचित करने वाले सुरक्षा की ओर अग्रसर रहते हैं बांटने वाले गतिशीलता की ओर. संचय हमें कमजोर करता है आत्मविश्वास को डिगा देता है, बांटना या देना हमें संघर्षशील बनाता है रचनात्मक बनाता है. दुर्योधन ने  देने या बांटने के कृत्य से दानवीर कर्ण की मित्रता प्राप्त की, बचाने या संचित करने के चक्कर सब कुछ गंवा बैठा।  इसलिए जीवन में देना सीखिये लेना नहीं। और याद रखिये,  देने वाला लोकप्रिय होता है लेने वाला नहीं।

Wednesday, April 22, 2015

कुछ गैर जरुरी सवाल

अस्पताल के कैंसर वार्ड में मौत का इन्तेजार करते लोगो से पूछिये की भाजपा अच्छी पार्टी है या कांग्रेस ? डायलिसिस मशीन के सहारे जिन्दा किडनी मरीजों से पूछिये की हिन्दू धर्म अच्छा है या इस्लाम या क्रिश्चियन ? कर्ज के बोझ से दबे जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उनके बच्चो से पूछिये की भारत की संस्कृति अच्छी है या पश्चिमी ? स्वाइन फ्लू और डेंगू जैसी बिमारिओ से मरने वाले गरीबो के परिवार से पूछिये की कश्मीर भारत का है या पाकिस्तान का ? कूड़ा चुनने वाले अनाथ बच्चो से पूछिए की देश सुपर पावर बनेगा या नहीं ? ये चंद सवाल हैं जो आपकी खोखली मानसिकता को रद्दी की टोकरी में डालने के लिए काफी हैं
.

सबसे लम्बे किसिंग सीन के मायने

हिंदी फिल्मो के बारे में कुछ मालूमात हासिल करने की कवायद में चंद उम्दा जानकारिओ से रूबरू हुआ. सोचा एक दिलचस्प बात आपको भी इत्तला की जाएँ, शेयर की जाएँ। हम जब ड्रीम गर्ल की बात करते हैं तो जेहन में दिलकश अदाकारा हेमा मालिनी की तस्वीर उभर आती है. पर ये दीगर मामला है और शायद कम लोगो को ये इल्म है की हिंदी फिल्मो की पहली ड्रीम गर्ल देविका रानी थी. जहाँ आज के आधुनिक और परिपक्व दर्शक भी लिप लॉक या स्मूच सीन को सहजता से नहीं ले पाते तो जरा सोचिये की 1933 में, जी हाँ आजादी से पहले प्रदर्शित अंग्रेजी फिल्म ‘कर्म’ में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक लिप टू लिप दृश्य देकर दर्शको का कैसा हाल किया होगा ? ये आज भी बॉलीवुड के सबसे लम्बे किसिंग सीन की फेहरिस्त में अव्वल दर्जे पर है. देविका रानी के साथ हिमांशु राय ने शादी कर ली, शादी के बाद हिमांशु ने साल 1934 में बॉम्बे टॉकीज बैनर की स्थापना की। इस बैनर तले बनी पहली फिल्म ‘जवानी की हवा’ में देविका रानी की अदाओ से घायल दर्शको ने इन्हे पहली स्वप्न सुंदरी ड्रीम गर्ल का दर्जा दे दिया। देविका आज के उन फिल्म निर्माताओं के मुह पर तमाचा भी जड़ती हैं जो समझते हैं की पुरानी फिल्म इंडस्ट्री के लोग modern and progressive नहीं थे. बेसिरपैर के आइटम सांग, बेड सीन, किस सीन etc ठूस कर modernism का शो ऑफ करने वाले निर्देशकों तुम आज भी 80 साल पीछे हो.

पाकीज़ा की दीगर शख्सियत

जिंदगी से बेज़ारी, दर्द से मोहब्बत, घुटन भरे अल्फाज, नाजुक अंदाज! ट्रैजिक क्वीन मीना कुमारी उर्फ़ महजबीं बानो की शख्सियत को ऐसे स्टीरिओटाइप चंद लाइनो में ही नहीं समेटा जा सकता। ये हकीकत है की उनके कंपकपाते होठो पर तैरती मुस्कान के पीछे रहस्यमयी दर्द भरी कहानियाँ है पर मीना कुमारी का व्यक्तित्व कुछ और भी है. मीना जी को कहानियां सुनने का बड़ा शौक था परियों की, दूर देश के राजा की. एक बार तो इन्होने ये कह दिया की इन्हे मौत बहुत पसंद है क्योंकि मौत की चुप्पी हर बीतते लम्हे में एक दिलचस्प कहानी सुनाया करती है. इन्हे बासी रोटी बहुत पसंद थी, नहीं मिलने पर रोने लग जाती थीं. डायरी लिखने का ऐसा शौक की पर्स में हमेशा डायरी रखती, कहतीं "कोई बात जेहन में आ जाती है तो उसको डायरी में कह देती हूँ बाद में सोच के लिखूंगी तो उस में बनावट आ जायेगी। जो मैं एक्टिंग करती हूँ वह ख्याल किसी और का है स्क्रिप्ट किसी और कि और डायरेक्शन किसी और का. इस में मेरा अपना कुछ भी नही. दरअसल मैं तो वो हूँ जो इस डायरी में लिखा है" गुलजार साहब ने मीना जी के लिए ये पंक्तियाँ लिखी "शहतूत की डाल पर बैठी मीना बुनती रेशम के धागे .. रेशम की यह कैदी शायद एक दिन अपने ही धागों में घुट कर मर जायेगी" और ऐसा हुआ भी ! दुनिया को अलविदा कहने से पहले मीना कुमारी ने अपनी डायरी कमाल अमरोही या धर्मेन्द्र को नहीं बल्कि गुलजार को गिफ्ट कर दी. गुलजार को ही क्यों ? जाते जाते भी लीजेंडरी एक्ट्रेस इक रहस्य छोड़ गयीं.

कादंबरी का आध्यात्मिक प्रेम और नासमझ समाज




कादंबरी ! साहित्य और फिल्मो में रूचि रखने वाले इस नाम से इत्तेफाक रखते होंगे। कादंबरी गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर की भाभी थीं. इन्होने टैगोर की रचनात्मक प्रतिभा का पोषण किया था उनकी प्रारंभिक गुरु थीं. दोनों के बीच आध्यात्मिक प्रेम था. एक ऐसा प्रेम जिसे जिस्मानी रिश्तो की पहचान करने वाला माँसल समाज नहीं परख सकता। कादंबरी निःसंतान थी. जाहिर तौर पे दोनों के बीच करीबी रिश्ते और भावनात्मक तादाम्य को गलत समझा गया. इतना गलत की कोफ़्त होकर कादंबरी ने आत्महत्या कर ली. गुरुदेव ने कादंबरी के ऊपर काल्पनिक उपन्यास 'नस्तनीड़' लिखी। सत्यजित रे ने इस पर आधारित फिल्म 'चारुलता' और बंधना मुखोपाध्याय ने 'चिरोशाखे' बनाकर कादंबरी के माथे पर लगे कलंक को हटाने की कोशिश तो की पर समाज की मानसिकता बदली क्या ?अपनी खोखली मान प्रतिष्ठा और नासमझी की वजह से ये समाज बहुत पहले से ही निर्दोषो का गला घोंटता रहा है. आज भी कितने ही घरो में कादंबरी रोज कलंकित होती है रोज मरती है. चुपके से. ना जाने हम रिश्तो को समझना कब सीखेंगे.